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स्वार्थी

कल रात अस्पताल के उस नीरव सन्नाटे में रोहन की आवाज़ किसी कर्कश शोर जैसी गूँजी। उसने रीवा को जोर-जोर से पुकारा, जैसे कोई गुलाम को ऑर्डर दे रहा हो। बगल वाले बेड पर लेटे पेशेंट की नींद टूटी, तो उसने चिढ़कर रोहन को अच्छी तरह सुना दिया। रीवा वहाँ खड़ी थी—एक ऐसी लड़की जिसके पास अपनी चुप्पी के अलावा ढाल के रूप में कुछ नहीं था। बिना किसी गलती के डांट सहने की आदत ने उसे अंदर से कहीं शांत और पत्थर बना दिया था।

​रोहन की आँखों में एक अजीब सी चमक थी, वो तिरछी और नफरत भरी नज़रें जो रीवा को अब इरिटेट ही नहीं, बल्कि अंदर तक झकझोरने लगी थीं।

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